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Corona’s के दबाव में लगातार तीसरे सप्ताह लुढ़का शेयर बाजार

मुंबई । लॉकडाउन के बीच वाणिज्यिक गतिविधियाँ शुरू किये जाने के बावजूद कोविड-19 के बढ़ते मामलों की चिंता में पिछले सप्ताह घरेलू शेयर बाजारों में एक फीसदी से अधिक की गिरावट रही।बाजार लगातार तीसरे सप्ताह लुढ़का है और जिस प्रकार कोविड-19 के नये मामले बढ़ रहे हैं, आने वाले सप्ताह में भी बाजार दबाव में रह सकता है। कोरोना वायरस के मामले बढ़ते हैं तो बाजार पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। देश में कोविड-19 के मरीजों की संख्या अब एक लाख 32 हजार के करीब पहुँच चुकी है।

पिछले सप्ताह बीएसई का सेंसेक्स 425.14 अंक यानी 1.37 प्रतिशत लुढ़ककर 30,672.59 अंक पर बंद हुआ। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी 97.60 अंक यानी 1.07 प्रतिशत की साप्ताहिक गिरावट के साथ सप्ताहांत पर 9,39.25 अंक पर आ गया।मझौली और छोटी कंपनियों पर ज्यादा दबाव रहा। बीएसई का मिडकैप दो प्रतिशत टूटकर सप्ताहांत पर 11,270.02 अंक पर और स्मॉलकैप 1.54 फीसदी गिरकर 10,524.23 अंक पर आ गया।पिछले सप्ताह सोमवार को ही शेयर बाजारों में करीब साढ़े तीन प्रतिशत की भारी गिरावट देखी गयी। सेंसेक्स 1069 अंक और निफ्टी 314 अंक टूट गया। इसके बाद पूरे सप्ताह बाजार वापसी नहीं कर सका। अगले तीन दिन लिवाली का जोर रहा जबकि शुक्रवार को एक बार फिर यह लाल निशान में बंद हुआ।

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शेयर बाजार गिरावट में

मुंबई । कोरोना वायरस संक्रमण से प्रभावित अर्थव्यवस्था काे गति देेने के लिए आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत विभिन्न क्षेत्रों के लिए की जा रही घोषणायें निवेशकों को बाजार की ओर आकर्षित करने में असफल होती दिख रही है क्योंकि शेयर बाजार में गिरावट का रूख बना हुआ है। शुक्रवार को भी शेयर बाजार गिरावट लेकर बंद हुआ।

बीएसई का सेंसेक्स 25.16 अंक गिरकर 31097.73 अंक पर और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) का निफ्टी 5.90 अंक फिसलकर 9136.85 अंक पर रहा। बीएसई में छोटी और मझौली कंपनियों में भी बिकवाली देखी गयी जिसेस मिडकैप 0.31 प्रतिशत उतरकर 11500.32 अंक पर और स्मॉलकैप 0.16 प्रतिशत उतरकर 10688.86 अंक पर रहा।

बीएसई में कुल 2493 कंपनियों में कारोबार हुआ जिसमें से 1229 गिरावट में और 1086 बढ़त में रहा जबकि 178 में कोई बदलाव नहीं हुआ।वैश्विक स्तर पर मिलाजुला रूख देखा गया। ब्रिटेन का एफटीएसई 0.69 प्रतिशत, जर्मनी का डैक्स 0.79 प्रतिशत, जापान का निक्केई 0.62 प्रतिशत और दक्षिण कोरिया का कोस्पी 0.12 प्रतिशत की बढ़त में रहा जबकि हांगकांग का हैंगसेंग 0.14 प्रतिशत और चीन का शंघाई कंपोजिट 0.07 प्रतिशत गिरकर बंद हुआ।

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ये कंपनी दे रही रोजाना 3 जीबी इंटरनेट डाटा, अन्य सेवाएं बिल्कुल फ्री

नयी दिल्ली। कोरोना वायरस के कारण लाकडाउन के इस दौर में घर से काम पर अधिक जोर दिया जा रहा है और इसके लिए निर्बाध चलने वाला इंटरनेट जरूरी है। इसी को ध्यान में रखकर रिलायंस जियो ग्राहकों के लिए केवल 999 के रिचार्ज पर 84 दिन तक हर रोज तीन जीबी हाईस्पीड डाटा के बाद 64 केबीपीएस असीमित डाटा का लाभ का नया प्लान लाई है।

मोबाइल सेवा को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाकर उपभोक्ताओं को अधिक से अधिक सेवाएं देने में हमेशा तत्पर जियो ने इस प्लान में कई अन्य सुविधाएं जिनमें वॉइस कॉल की सुविधा, जियो से जियो और लैंडलाइन पर मुफ्त और असीमित कॉल भी शामिल है।प्लान में जियो से दूसरे नेटवर्क पर 3000 मिनट की कॉलिंग मुफ्त दी गई है।

इसके अलावा 84 दिन तक 100 एसएमएस प्रति दिन की सुविधाएं दी गई है। ग्राहकों सबसे अधिक इंटरनेट डाटा देने के मामले में रिलायंस जियो क्षेत्र की अन्य कंपनियों से हमेशा आगे रहती है और अपने प्रीपेड और ब्रॉडबैंड प्लान्स में हमेशा बदलाव करती रहती है।

प्लान में ग्राहकों को जियो एप्स का सबस्क्रिप्शन पूरक मिलेगा।रिलायंस जियो की आक्रामक नीति और ग्राहकों के लिए वाजिब दरों पर नये-नये प्लान का परिणाम है कि कंपनी ने चार वर्ष के भीतर ही अन्य कंपनियों का वर्चस्व तोड़कर करीब 39 करोड़ ग्राहक का नेटवर्क बना लिया और मोबाइल सेवा की अगुआ बन गई।

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कोरोना रोगियों को दी जा रही दवा के तीन डोज की कीमत 1.80 लाख

मुम्बई में कोरोना संक्रमण से जूझ रहे रोगियों को बचाने के लिए टोसिलीजुमैब दवा दी जा रही है, उसके तीन डोज की कीमत एक लाख अस्सी हजार रुपए है। इस दवा के परिणाम अच्छे आए हैं लेकिन इसका बड़े पैमाने पर उपयोग करने से पहले इसकी कीमत रास्ते का रोडा बन गई है।

आइटोलिजुमैब का कोरोना के उपचार में इस्तेमाल

जानकारी के अनुसार हाल ही दो दवा कंपनियां रॉश और बायोकॉन भी कोरोना वायरस से मुकाबले के लिए दवाएं पेश करने की होड़ में शामिल हो गई हैं। रॉश की गठिया रोग की सिप्ला द्वारा बेची जाने वाली दवा एक्टेम्रा (टोसिलिजुमैब) को कोविड-19 मरीजों में सूजन दूर करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, वहीं बायोकॉन अपनी सोरायसिस की दवा आइटोलिजुमैब में बदलाव लाकर इसका कोरोना वायरस के उपचार में इस्तेमाल कर रही है।

टोसिलीजुमैब का भी उपयोग

दोनों दवाओं का परीक्षण मुंबई के नायर हॉस्पिटल और किंग एडवर्ड मेमोरियल (केईएम) हॉस्पिटल में गंभीर रूप से बीमार कोरोना मरीजों पर किया जा रहा है। रॉश की टोसिलीजुमैब का इस्तेमाल कर रहे नायर हॉस्पिटल में दो मरीजों के स्वास्थ्य में बड़ा सुधार दिखा है और उन्हें वेंटिलेटर से हटाया जा सकता है। वहीं केईएम में भी मरीज को बायोकॉन की आइटोलिजुमैब दवा दी गई।

मरीजों में बनता है साइटोकिन

मणिपाल हॉस्पिटल्स में इंटरवेंशनल पलमोनोलॉजी ऐंड स्लीप मेडिसिन के एचओडी सत्यनारायण मैसूर के अनुसार मुंबई में, कोरोनावायरस के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। अब तक टोसिलिजुमैब का इस्तेमाल कोविड-19 मरीजों में ज्यादा साइटोकिन बनने से रोकने के लिए इंटरल्यूकिन-6 के तौर पर किया जा रहा था। अब इसे आइटोलिजुमैब के तौर पर पुन: तैयार कर इसका परीक्षण किया जा रहा है। मणिपाल हॉस्पिटल्स कर्नाटक में गठित कोविड-19 कार्यबल का भी सदस्य है।

एक खुराक की कीमत लगभग 60,000 रुपये

वृहनमुंबई नगरपालिका (बीएमसी) ने 120 से ज्यादा उन मरीजों पर इन दवाओं को आजमाने का निर्णय लिया है जिनकी उसने पहचान की है और उसका मानना है कि इन दवाओं से उन्हें लाभ मिल सकता है। लेकिन समस्या कीमत को लेकर है। इसकी एक खुराक की कीमत लगभग 60,000 रुपये है। इस दवा की तीन खुराक लेने के लिए मरीज को 1.8 लाख रुपये चुकाने की जरूरत होगी। आईटोलिजुमैब को अलजुमैब ब्रांड नाम के तहत भारत में 2013 में बायोकॉन ने तैयार करके पेश किया। इस दवा को गंभीर त्वचा रोग सोरायसिस के इजाज के लिए विकसित किया गया था।

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आर्थिक धरातल पर लगातार लुढ़कते हुए रसातल में जा रहा है देश का ये क्षेत्र

कोरोना वायरस ‘कोविड-19 के मद्देनजर जारी लॉकडाउन के कारण देश के सेवा क्षेत्र की गतिविधियों में अप्रैल में जबरदस्त गिरावट दर्ज की गई। विदेशी तथा घरेलू माँग में तेज गिरावट के कारण आईएचएस मार्किट द्वारा बुधवार को जारी सेवा कारोबार गतिविधि सूचकांक घटकर 5.4 रह गया जबकि मार्च में यह 49.3 दर्ज किया गया। सूचकांक का 50 से नीचे रहना गतिविधियों में कमी और इससे ऊपर रहना वृद्धि को दर्शाता है।

अप्रैल की गिरावट एजेंसी के सर्वेक्षण के 14 साल के इतिहास में सबसे तेज गिरावट है। इस रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुये आईएचएस मार्किट के अर्थशास्त्री जो हेज ने कहा ”अप्रैल में देश की सेवा क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में माह दर माह आधार पर अब तक की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गयी है। चालीस अंकों से अधिक की यह गिरावट दिखाती है कि लॉकडाउन के कड़े प्रतिबंधों के कारण इस क्षेत्र में लगभग ठहराव आ गया है।

सर्वे में हिस्सा लेने वाले 97 प्रतिशत कंपनियों ने बताया कि उनके कारोबार में कमी आयी है। अंतर्राष्ट्रीय बिक्री का सूचकांक घटकर शून्य पर आ गया। कई क्लाइंटों ने पुराने ऑर्डर भी रद्द किये जिसने उत्पादन में गिरावट में और योगदान दिया। इससे पहले 04 मई को विनिर्माण क्षेत्र के आँकड़े जारी हुये थे जिसमें खरीद प्रबंधक सूचकांक (पीएमआई) लुढ़ककर 27.4 अंक पर रह गया था।

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टेराकोटा के घोड़े और बैल ने यूरोप में झंडे गाड़े, ऊंट और बकरी भी पीछे नहीं

सदियों पुरानी पारंपरिक कला टेराकोटा को जीआई टैग के साथ ही बौद्धिक संपदा अधिकारों के एक घटक का दर्जा मिल गया है। टेराकोटा ऐसी कला है जिसमें कुम्हार हाथ से विभिन्न जानवरों की मूर्ति जैसे कि घोड़े, हाथी, ऊंट, बकरी, बैल आदि बनाते हैं।

टेराकोटा शिल्प को जीआई टैग

टेराकोटा शिल्प को पिछले गुरुवार को जीआई टैग दिया गया था। इसके लिये गोरखपुर के औरंगाबाद गुलेरिया के लक्ष्मी टेराकोटा मूर्तिकला केंद्र ने आवेदन किया था। खासकर सजे-धजे टेराकोटा घोड़े न सिर्फ इन इलाकों की पहचान हैं, बल्कि दुनिया में भी इन्होंने अपनी कला के झंडे गाड़े हैं। कुम्हार चाक पर अलग-अलग हिस्सों को आकार देने के बाद में उन्हें जोड़ कर एक आकृति तैयार करता है। शिल्प कौशल के कुछ प्रमुख उत्पादों में हौदा हाथी, महावतदार घोड़ा, हिरण, ऊँट, पाँच मुँह वाले गणेश, एकल-हाथी की मेज, झाड़ लटकती हुई घंटियाँ आदि हैं। पूरा काम हाथों से किया जाता है। कारीगर प्राकृतिक रंगों का उपयोग करते हैं। रंग लम्बे समय तक तेज रहता है।

पेरिस कन्वेंशन के तहत बौद्धिक संपदा अधिकार

स्थानीय कारीगरों द्वारा डिजाइन किए गए टेराकोटा काम की 1,000 से अधिक किस्में हैं। गोरखपुर में शिल्पकार मुख्य रूप से गोरखपुर के चरगवां ब्लॉक के भटहट और पडऱी बाजार, बेलवा रायपुर, जंगल एकला नंबर-1, जंगल एकला नंबर -2, औरंगाबाद, भरवलिया, लंगड़ी गुलेरिया, बुढाडीह, अमवा, एकला आदि गाँवों में बसे हुए हैं। गौरतलब है कि जीआई टैग को औद्योगिक संपत्ति के संरक्षण के लिए पेरिस कन्वेंशन के तहत बौद्धिक संपदा अधिकारों के एक घटक के रूप में शामिल किया गया है।

दार्जिलिंग टी जीआई टैग प्राप्त करने वाला पहला उत्पाद

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जीआई का विनिमय विश्व व्यापार संगठन के बौद्धिक संपदा अधिकारों के व्यापार संबंधी पहलुओं पर समझौते का तहत किया जाता है। राष्ट्रीय स्तर पर वस्तुओं का भौगोलिक सूचक (पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम 1999 के तहत किया जाता है, जो सितंबर 2003 में लागू हुआ था। वर्ष 2004 में दार्जिलिंग टी जीआई टैग प्राप्त करने वाला पहला उत्पाद है। जीआई का उपयोग कृषि उत्पादों, हस्तशिल्प, औद्योगिक उत्पादों आदि के लिए किया जाता है।

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कोरोना से परेशान महिलाओं के लिए राहत की खबर, सिलेंडर पर बचेंगे 162 रुपए

वैश्विक महामारी कोरोना वायरस( कोविड-19) के कारण देशभर में जारी पूर्णबंदी के बीच खाना पकाने की गैस (एलपीजी) का इस्तेमाल करने वाले उपभोक्ताओं के लिए एक राहत भरी खबर है।

शुक्रवार से गैर सब्सिडी वाले एलपीजी सिलेंडर 162 रुपये की बडी कमी की गई है। देश की अग्रणी तेल विपणन कंपनी के अनुसार नयी दरें आज से प्रभावी हो गई हैं। दिल्ली में गैर सब्सिडी वाला सिलेंडर 162.50 रुपये कम होकर पहले के 744 रुपये से मई माह के लिए 581.50 रुपये प्रति सिलेंडर पर मिलेगा। सरकार रसोई गैस उपभोक्ता को एक वित्त वर्ष में 12 सिलेंडर सब्सिडी दर पर देती है और इससे अधिक की मांग पर बाजार कीमत देनी पडती है। मुंबई में नई दर 579 रुपये प्रति सिलेंडर होगी। कोलकाता में यह 584.50 रुपये और चेन्नई में 569.50 रुपये प्रति सिलेंडर पर मिलेगा।
इधर वैश्विक महामारी कोरोना वायरस (कोविड-19) के कारण पूरे देश में लागू लॉकडाउन का ऑटोमोबाइल उद्योग पर व्यापक असर पड़ा है और इस क्षेत्र की अग्रणी कंपनी मारुति सुजुकी इंडिया लिमिटेड की अप्रैल माह में घरेलू बाजार में बिक्री शून्य रही।

कंपनी ने शुक्रवार को अप्रैल माह के बिक्री आंकड़ों को जारी करते हुए बताया कि लॉकडाउन की वजह से मारुति की सभी इकाइयों में उत्पादन बंद रहा था। मारुति ने कहा है कि अब लॉकडाउन में कुछ ढील मिलने के बाद आंशिक उत्पादन शुरू हुआ है और मुन्द्रा बंदरगाह से 632 यूनिट का निर्यात किया गया है।

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अब केले पर मंडराया कोरोना वायरस का साया, हजारों टन केला……

कोरोना से खेती को भी बड़ा नुकसान हुआ है। इसकी वजह से उत्तरप्रदेश में हजारों टन केले की पैदावार नहीं हो सकी। उत्तरप्रदेश के कुछ जिलों में टिशू कल्चर केले की खेती की जाती है जिसके बीज महाराष्ट्र और दक्षिण के राज्यों से आते हैं। लेकिन कोरोना के चलते इसके बीज नहीं आ पा रहे हैं।

उत्तर प्रदेश में बाराबंकी, अयोध्या, सीतापुर, गोंडा, बहराइच, संतकबीरनगर, श्रावस्ती, गोरखपुर, महाराजगंज, देवरिया, बलिया, वाराणसी समेत पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिलों मे टिशू कल्चर केले की खेती बडे पैमाने पर होती है लेकिन कोरोना को लेकर इस खेती पर भी आफत आ गई है। राज्य मे करीब एक लाख हेक्टेयर में टिशू कल्चर के केले की खेती की जाती है लेकिन अभी तक इसके बीज की व्यवस्था नहीं हो पायी है जबकि इस खेती के लिए खेत पूरी तरह तैयार हैं। चूंकि इसके बीज दक्षिण के राज्यों से आते हैं इसलिए बीजों का आना मुश्किल माना जा रहा है।

टिशू कलचर खेती मे अपनी अलग पहचान बना चुके किसान रामशरण कहते हैं कि एक लाख हेक्टेयर मे केले की खेती के लिए करीब तीन करोड़ बीजों की जरूरत होगी। आवागमन बंद होने के कारण इतना बीज आना मुश्किल ही नहीं असंभव है। रामशरण को टिशू कलचर खेती के लिए पद्मश्री भी मिल चुका है। उद्यान विशेषज्ञों के अनुसार पिछले साल टिशू कल्चर केले की राज्य मे बंपर पैदावार हुई थी और किसानों ने मोटा मुनाफा कमाया था।

पिछले साल के मुनाफे को देखकर कुछ नये किसान भी इस क्षेत्र मे आ गए और अपने खेतों को टिशू कल्चर केले की खेती के लिए तैयार किया लेकिन बीज को लेकर अभी भी अनिश्चितता के हालात के कारण किसान अब उदास हैं। रेल के साथ हवाई सेवा भी पूरी तरह से बंद है, इसके बीज हवाई जहाज से भी आते रहे हैं लेकिन यह सुविधा भी उपलब्ध नहीं है। निचोड़ यह है कि टिशू कल्चर केले की खेती पर इस बार आफत है। किसान इसके लिए किसी को दोष भी नहीं दे सकते कयोंकि देश कोरोना जैसी महामारी से लड रहा है।

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भगवान के चरणों की अपेक्षा खेतों में नष्ट हो रहे हैं सुगंध के साथ सौंदर्य के प्रतीक फूल

कोविड 19 ने भगवान के चरणों में अर्पित किए जाने वाले फूलों की ऐसी दुर्गति की है कि वे अब खेतों में ही अंतिम सांस लेने को मजबूर है। सुगंध के साथ सौंदर्य के प्रतीक फूलों के कारोबार को देश में जारी लाकडाउन ने भारी नुकसान पहुंचाया है और बागों में फूलों के साथ साथ किसानों के चेहरे भी मुरझा गये हैं।

गंगा-यमुना के कछारी क्षेत्र में बसा नैनी फूलो की खेती के लिए उपजाऊ माना जाता है। यहां गुलाब, गेंदा, गुलाब, सूरजमुखी, चमेली के फूलों की खेती की जाती है। लॉकडाउन के कारण मंडियों में फूलों की आवक बंद होने से प्रतिदिन लाखों रूपये मूल्य के फूल का कारोबार चौपट हो गया है। फूलों की खेती कर किसान अच्छी कमाई करते हैं लेकिन शादी विवाह के दौर में लॉकडाउन होने से फूलों का कारोबार बंद हो गया जिससे बड़ी समस्या उत्पन्न हो गयी। फूलों की खेती से परोक्ष और अपरोक्ष तौर पर कम से कम 1500 से 2000 लोग जुड़े हुए है।

गुलाब की खेती को तवज्जो

एक उद्यान अधिकारी के अनुसार चाका, सबहा, सोनई का पुरवा और धनपुर समेत कई गांवों में फूलों की खेती से किसान लाभ कमाते हैं। चाका गांव के किसान तो गेहूं, धान आदि की फसल छोड़कर गुलाब की खेती को तवज्जों दे रहे हैं। नैनी में यमुनापार के अरैल, गंजिया, देवरख, खरकौनी, मवइया, कटका और पालपुर समेत करीब 40-45 से अधिक गांवो में फूल की खेती होती है। सामान्य दिनों में तडके पुराने यमुना पुल के पास और गऊघाट में फूल मंडी सज जाती थी। फूलों की सप्लाई शहर के अलावा कौशांबी, प्रतापगढ़, जौनपुर, वाराणसी, पडोसी राज्य मध्य प्रदेश के रींवा, कोलकत्ता और छत्तीसगढ़ तक महक भेजी जाती है। महामारी के कारण घोषित लॉकडाउन से इन्हें खरीदने वाला कोई नहीं है। फूलों की तरह खिला रहने वाला किसानों का चेहरा कारोबार ठप होने से मुरझा गया है। छोटे से लेकर बड़े मंदिर, देवालय और तीर्थस्थल तक, सब बंद पड़े हैं।

बर्बाद हो गया यह सीजन 

हर तरह के आयोजनों पर पूरी तरह रोक है। ऐसे में फूल किसानों और कारोबारियों का यह सीजन बर्बाद हो गया है। नवरात्रि के दिनों में फूलों की डिमांड ज्यादा होती है। लेकिन, इस बार सब ठप्प होने से काफी नुकसान हुआ है। फूलों की बिक्री बंद होने से किसानों के सामने रोजी-रोटी का संकट उत्पन्न हो गया है। पौधों पर सूखते फूलों को देखकर कोरोना के कारण किस्मत को कोसने को मजबूर हैं। उन्होने बताया कि किसानों को पौधों को बचाने के लिए फूलों को तोड़कर खेत में गिराना पड़ रहा है।

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फलों के बीज, छिलके और लहसुन के तेल से बनी दवा करेगी कोरोना का सफाया

भारत के बायोटेक्नोक्रेट कोरोना संक्रमण से निपटने के लिए प्रोटीन अवरोधक के रूप में फलों के बीज और छिलकों तथा लहसुन के कुदरती तेल के प्रयोग से चिकित्सकीय और मूल्यवान औषधीय घटकों को अलग करने की कोशिश में जुटे हुए है।

 

 

पंजाब के मोहाली में बायोटेक्नोलॉजी सेंटर ऑफ इनोवेटिव एंड एप्लाइड बायोप्रोसेसिंग (डीबीटी-सीआईएबी) विभाग ने ऐसी अनेक अनुसंधान परियोजनाएं शुरू की हैं जिनका उद्देश्य ऐसे उत्पाद तैयार करना है जो घातक कोरोना वायरस ‘कोविड-19Ó संक्रमण की रोकथाम, निदान या इलाज के लिए किया जा सकता है जो वर्तमान में पूरी दुनिया में बड़े पैमाने पर फैला हुआ है। इस योजना को इसके वैज्ञानिकों की विशेषज्ञता का उपयोग करने के लिए तैयार किया गया है, जो रसायन, रासायनिक इंजीनियरिंग, जैव प्रौद्योगिकी, आणविक जीव विज्ञान, पोषण, नैनो प्रौद्योगिकी सहित अनुसंधान के विविध वर्गों से आते हैं। रोग निरोधी प्लेटफॉर्म के अंतर्गत संस्थान ने एंटीवायरल कोटिंग सामग्री विकसित करने के लिए काष्ठ अपद्रव्यता (लिग्निन) से उत्पन्न नोबल धातु नैनो कम्पलेक्सों और चिकित्सा शास्त्र प्लेटफॉर्म के तहत रॉक ऑक्साइड-समृद्ध सिट्रोनेला तेल, कार्बोपोल और ट्राइथेनोलामाइन युक्त अल्कोहल सैनिटाइजर का उपयोग करने पर काम करने की योजना बनाई है।

ऐसे होगा कुदरती तत्वों से इलाज

इसमें पोलीपायरोलिक फोटोसेन्सीटाइजरों और एंटीवायरल फोटोडायनामिक थेरेपी, इम्युनोमोडायलेटरी के माइक्रोबियल उत्पादन और संक्रमण रोधी फ्रक्टन बायोमॉलिक्यूल्स तथा कोरोना संक्रमण से पीडि़त व्यक्ति की छाती में भारीपन (कंजेशन) को कम करने के लिए नैजल स्प्रे किट के विकास और उसके व्यावसायिक निर्माण के लिए उसके नैनो संरूपण पर मुख्य रूप से ध्यान दिया जाएगा। दवा की खोज प्लेटफ़ॉर्म के अंतर्गत, इस अनुसंधान से सार्स-सीओवी-2 को रोकने के लिए एसीई 2 प्रोटीन अवरोधक के रूप में फलों के बीज और छिलकों तथा लहसुन के कुदरती तेल के प्रयोग से चिकित्सीय और मूल्यवान औषधीय घटकों को अलग करने के बारे में पता लगाया जाएगा। इसके अलावा, संक्रमण रोधी दवा की डिलीवरी की संभावना और न्यूट्रास्युटिकल के रूप में करक्यूमिन फोर्टीफाइड छाछ प्रोटीन पाउडर का उपयोग करने के साथ एंटीवायरललिग्निन से उत्पन्न नैनोकैरियर्स (एलएनसी) के विकास के लिए भी अध्ययन किया जाएगा।